Monday, 7 September 2009

Global warming- India may lose south west monsoon in next 150 years






A study says, India may lose one of its crucial lifelines the south west monsoon, which brings rains across the country during the summers, in the next 150 years. Researchers say, the phenomenon is the result of global warming which has led to increase in the rate of temperature rise over Arabian Sea. A new study by Indian Institute of Tropical Meteorology warns that this rise is reducing temperature difference between land and sea, known as Temperature Gradient, responsible for attracting rain causing winds from Arabian Sea towards Indian mainland. It says, once the gradient becomes zero, the monsoon winds will be replaced by dry easterly winds thus disturbing the flow of south-west monsoon. The Indian Meteorology Department has shown a 23 per cent reduced rain activity during the present season, which may be an indication of this phenomenon. Global warming, which is increasing the average temperature across the planet, is also behind the increasing temperature over the Arabian sea, the study says.

Sunday, 6 September 2009

पानी के संकट से जूझता भारत--आखिर कब तक???(bbc से साभार)


पानी के संकट से जूझता भारत

पानी का इंतज़ार करते बच्चे
देश के कई शहरों में पानी की आपूर्ति टैंकरों से ही होती है.
भारत में ख़राब मानसून का असर साफ़ दिखने लगा है और देश के मुंबई शहर में पानी की आपूर्ति में कटौती की घोषणा की गई है.
बीबीसी संवाददाता जुबैर अहमद के अनुसार मुंबई के क़रीब दो करोड़ लोगों को पानी की आपूर्ति में तीस प्रतिशत की कटौती कर दी गई है.
अधिकारियों का कहना है कि उनके पास सिर्फ़ अगले दो महीनों के लिए पानी बचा हुआ है और अगर मानसून अपने पूरे ज़ोर से समय पर नहीं आता तो मुंबई के लोगों के लिए पानी ही नहीं होगा. अधिकारी कृत्रिम वर्षा के लिए बादल बनाने की योजना पर भी विचार कर रहे हैं.
महानगरों, अनेक राज्यों में समस्या

मुंबई ही नहीं देश के की इलाक़े पहले से ही पानी की समस्या से जूझ रहे हैं लेकिन यह समस्या महानगरों में विकराल रुप लेती जा रही है.

राजधानी दिल्ली में कुछ ही समय पहले पानी और बिजली की कमी के कारण लोगों ने ज़बर्दस्त विरोध प्रदर्शन किए थे. अभी भी दिल्ली के कई इलाक़ों में पानी की आपूर्ति पर्याप्त नहीं मानी जाती है.
देश के बड़े राज्य मध्य प्रदेश, बिहार और राजस्थान के अनेक क्षेत्रों में ऐसी ही हालत है. वहाँ कई इलाक़ों में हर साल गर्मियों में पानी की कमी हो जाती है.
बीबीसी संवाददाता फ़ैसल मोहम्मद अली इस वर्ष मध्य प्रदेश के उज्जैन और इंदौर जैसे शहरों में सरकार ने स्पष्ट कर दिया था कि इस बार पानी की दिक्कत होगी.
इन स्थानों पर अब पांच पांच दिनों पर एक बार पानी मिल पाता है. राजधानी भोपाल में स्थित सबसे बड़ा ताल पूरी तरह सूख गया है और इसमें बिल्कुल पानी नहीं है.
सरकार के पास जल से जुड़ी न तो कोई व्यापक नीति है और न ही इस पर कोई गंभीर काम हो रहा है. शहरों में पानी की बर्बादी अधिक होती है और ये शहरों में पानी की कमी का एक बड़ा कारण है
विशेषज्ञ राजेंद्र सिंह
इसके पीछे मानसून के समय पर न आने को भी एक कारण बताया जा रहा है. पिछले दिनों भोपाल में पानी की आपूर्ति को लेकर स्थानीय लोगों के बीच झड़पों में तीन लोगों की मौत हो गई है.

राज्य के कुछ स्थानों पर पानी की पाइपलाइनों पर पुलिस का पहरा लगा दिया है क्योंकि लोग इन पाइपों को तोड़ कर पानी निकाल ले रहे हैं.

फ़ैसल मोहम्मद अली का कहना है कि पानी की कमी के पीछे पानी के टैंकर बेचने वाले व्यवसायियों का हाथ भी हैं क्योंकि पानी के व्यवसाय में उन्हें बड़ा फ़ायदा है और इससे कई राजनीतिक नेता भी जुड़े हुए हैं.
उल्लेखनीय है कि दिल्ली में भी कुछ इलाक़ों के बारे में ऐसा ही कहा जाता है कि पानी का बड़ा व्यवसाय फल फूल रहा है.
बीबीसी संवाददाता मणिकांत ठाकुर के अनुसार पूरे राज्य में पानी का संकट बना हुआ है.
जहाँ नालंदा के देहाती क्षेत्र में पानी का स्तर बहुत नीचे चला गया है, वहीं औरंगाबाद में डेढ़ महीने से लोग बोरिंग कराने के प्रयास में हैं ताकि पीने के पानी की सप्लाई सुनिश्चित हो सके.
पालीगंज और विक्रमगंज समेत पटना के आसपास भी अनेक क्षेत्रों में हज़ारों लोग काफ़ी दिक्कत झेल रहे हैं.

विशेषज्ञ की राय

जल संसाधनों के लिए काम करने वाले राजेंद्र सिंह कहते हैं कि पानी को लेकर दिक्कत भारत में तब तक रहेगी जब तक इस पर कोई व्यापक नीति नहीं बनाई जाती.
विशेषज्ञ राजेंद्र सिंह कहते हैं, |"सरकार के पास जल से जुड़ी न तो कोई व्यापक नीति है और न ही इस पर कोई गंभीर काम हो रहा है. शहरों में पानी की बर्बादी अधिक होती है और ये शहरों में पानी की कमी का एक बड़ा कारण है."
वो जैसलमेर जैसे रेगिस्तानी शहर का उदाहरण देते हैं और कहते हैं कि जब ऐसे शहर कम पानी के साथ फल-फूल सकते हैं तो भारत के अन्य शहर ऐसा क्यों नहीं कर सकते लेकिन देश में इससे जुड़ी नीतियां नहीं हैं.

    बढ़ रहा है आर्कटिक का तापमान(bbc से साभार)


    बढ़ रहा है आर्कटिक का तापमान

    ग्लेशियर
    दुनिया भर के उन सभी इलाक़ों में बढ़ते हुए तापमान का असर दिख रहा है जहां बर्फ़ है.
    अमरीका में हुए नए शोध के मुताबिक आर्कटिक क्षेत्र में पिछले दो हज़ार सालों में ताममान सबसे अधिक हो गया है जो इस बात का संकेत है कि मानवीय गतिविधियों के कारण पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है.
    वैज्ञानिकों का कहना है कि आर्कटिक में पूरे उत्तरी गोलार्ध की तुलना में तीन गुना तेज़ी से तापमान बढ़ रहा है और इसकी वजह मानवीय गतिविधियों से पैदा हो रही कार्बन डाई ऑक्साइड है.
    ये शोध अमरीकी पत्रिका जर्नल साइंस में छपा है.
    शोध के अनुसार पिछले सात हज़ार वर्षों में एक ऐसी प्राकृतिक स्थिति बननी थी जिसमें आर्कटिक के क्षेत्र को सूरज की कम से कम रोशनी मिलनी चाहिए थी. इस प्रक्रिया के तहत आर्कटिक को अब भी ठंडा होते रहना था. हालांकि ऐसा हुआ नहीं. वर्ष 1900 के बाद आर्कटिक का तापमान बढ़ता जा रहा है और 1950 के बाद इसमें और अधिक तेज़ी आ गई है.
    आर्कटिक में हो रहा बदलाव जलवायु परिवर्तन है. आईपीसीसी ने जो कल्पनाएं की थीं वो सही साबित हो रही हैं. आर्कटिक गर्मी को सोख रहा है और बर्फ ख़त्म हो रही है. गर्मी बढ़ रही है
    बान कि मून
    पिछले 2000 वर्षों में आर्कटिक का तापमान अभी सबसे अधिक है. पिछली एक सदी में आर्कटिक का तापमान पूरे उत्तरी गोलार्ध की तुलना में तीन गुना तेज़ी से बढ़ा है. शोधकर्ताओं का कहना है कि इसमें अब कोई शक नहीं रह गया है कि तापमान बढ़ने की वजह सिर्फ़ और सिर्फ़ मानवीय गतिविधियों के कारण पैदा होने वाला कार्बन डाई आक्साइड है.
    वैज्ञानिकों ने भूगर्भीय रिकार्डों और कंप्यूटरों की मदद से पिछली दो शताब्दियों में तापमानों का खाका तैयार किया है. वैज्ञानिकों ने चेताया है कि अगर आर्कटिक का तापमान बढ़ता ही रहा तो इससे समुद्र के जल स्तर में तेज़ी से बढ़ोतरी हो सकती है
    संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून भी आर्कटिक के दौरे से लौटे हैं और उन्होंने भी इस पर चिंता जताई है.
    उनका कहना था, ''आर्कटिक में हो रहा बदलाव जलवायु परिवर्तन है. आईपीसीसी ने जो कल्पनाएं की थीं वो सही साबित हो रही हैं. आर्कटिक गर्मी को सोख रहा है और बर्फ ख़त्म हो रही है. गर्मी बढ़ रही है. इससे समुद्र का जल स्तर बढ़ेगा. हम लोग गंभीर खतरे की तरफ़ बढ़ रहे हैं.''
    महासचिव ने जेनेवा में दिए भाषण में कहा कि अगर विश्व भर के नेताओं ने जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए पर्याप्त क़दम नहीं उठाए तो दुनिया को सर्वनाश से कोई नहीं बचा सकता है.